गीत -कृपा श्री राम जी कर दो सहारा है नहीं कोई |

कृपा श्री राम जी कर दो, सहारा है नहीं कोई |
सभी मतलब के’ साथी है, हमारा है नहीं कोई ||

चढ़ा कर स्वार्थ को सर पर, सभी रिश्ते चलाते है |
हुई दुनिया मतलबी है, यहाँ मतलब के’ नाते है ||
न करता प्रेम कोई है, यहाँ पर तो बिना मतलब |
अगर दौलत जो’ मिल जाए, तो प्यारा है नहीं कोई ||

धरा पर दीन होकरके, विवेकी जन भटकते है |
विदूषक बेंच वेदों को, धरम दुह कर चहकते है ||
लबारी ब्रह्म ग्यानी बन, दिखाते ज्ञान का कौशल |
है’ उजड़ा धर्म का अम्बर, सितारा है नहीं कोई ||

दया की दृष्टि दो राघव, भगत वत्सल हो’ रघुनन्दन |
शरण में अब तुम्हारी हम, हमारा उर करों चन्दन ||
सभी ठुकरा चुके मुझको, तुम्हारा इक सहारा है |
फंसा मैं पीर सागर में, किनारा है नहीं कोई ||

कभी गज को उबारा था, कभी रावण को’ मारा था |
समन्दर दर्प को तोड़ा, अहिल्या को भी’ तारा था ||
को’ई अन्दर समन्दर पीर, जैसी जग गई दिल में |
करो उद्धार रघुनन्दन, उतारा है नहीं कोई ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9582510029

Leave a Reply