जीवन देती बेटियाँ, जीवन हारती बेटियाँ

यूँ नोंचती बचपन को निगाहें, और वो जान बेजान हो जाती हैं।
लड़कियाँ नजरों को झुकाए-झकाए, बिन बचपन बड़ी हो जाती हैं।।
बचपन में माँ की गोद में खतरा, जाने कब जीवन समाप्त हो जाए।
क्या जन्म अधिकार केवल लड़के का, क्यों उसे ही प्राथमिकता दी जाए।।

जब जन्म हुआ तब भी मुश्किल, सारे कर्तव्य उन्हीं पर आते हैं।
निर्वहन सभी जिम्मेदारी का, पर अधिकार नहीं मिल पाते हैं।।
खाना कम, खेलना बंद, शिक्षा पर कोई भी जोर नहीं।
फिर भी जीती विषम पलों में, यें लड़कियाँ कहीं से भी कमजोर नहीं।।

बचपन वो जो जीया नहीं, जो चाहा वो मिला नहीं।
दुःख में पर मुस्कान अधर पे, कभी किसी से गिला नहीं।।
सागर से भी गहन धैर्य, कितना वो सब सहती हैं।
फिर भी बेटी अपना दुःख-सुख, नहीं किसी को कहती है।

एक आस धरे अपने मन में, कोई अच्छा साथी मिल जाए।
शायद वही कुछ दिल की समझे, संबंध नियंता मिल जाए।।
और किसी दिन यह अवसर भी, आंगन में आ जाता है।
माँ घर छोड़ना होगा, फिर दहल दिल उसका जाता है।।

जैसे तैसे वह बेबस, इस कड़वे घूँट को पीती है।
नए घर में नया है सबकुछ, दोतरफा जीवन जीती है।।
घर भी छोड़ना उसको ही था, सारे त्याग उसी सर मढ़े गए।
लड़के सारा जीवन जीते, सारे अधिकार उन्हीं के लिए रखे गए।।

अगर यहाँ अगले घर में भी, लड़कियाँ फिर से पीटीं जाती हैं।
फिर तो उसके जीवन में, सूली सी लग जातीं है।।
फिर कहाँ प्रेम, कहाँ स्नेह, जीवन में फिर रस है कहाँ।
कैसे खुश हो निज कन्या पे, खुशी बेटी की बस में कहाँ।।

अपनी हार से संतुष्ट हो सकती, कैसे हारते बेटी को देखे।
जन्म न हो कन्या मेरे घर, शायद दूर भविष्य की सोचे।।
लेकिन अपनी हार को उसको, जीत का रूप देना होगा।
लड़की के अधिकार की खातिर, जन्म खुश हो देना होगा।।

सोचो लड़की खातिर ऐसा, गर्व उन्हें अपने ऊपर हो।
बोलो उनसे कदर से ऐसे, वो जैसे अपने ही घर पर हो।।
देखो उस सम्मान से उनको, गर्व हमें अपने ऊपर हो।
रहो मर्यादा से उन संग तुम, भविष्य हमारा नभ पर हो।।

कुछ तो ऐसा करना होगा, बचपन ना लुटे किसी लड़की का ।
वो भी ऐसे खेले और पढ़े, अधिकार वो हो जो लड़के का ।।
चंगुल से छुड़वा लो बचपन, यौवन भी सशक्त रहे ।
डर लगता लड़की पैदा होवे, ना कोई माँ ये शब्द कहे

अरुण जी अग्रवाल

2 Comments

  1. rakesh kumar 28/11/2014
  2. अरुण जी अग्रवाल 29/11/2014

Leave a Reply