मन्दिरो में रहा हूं मै

मस्जिदो में रहा हूं मै
मन्दिरो में रहा हूं मै।
पूजते रहे हो तुम जिन्हें देवता की तरह,
उन्ही पत्थरों में रहा हू मै।
नही भाता है मुझे मजहबी दंगल,
हमेशा ही दिल ए दिलबरो मे रहा हू मै।
ना खींच पायी है मुझे महलो की रौनक,
सुदामा के घरौंदो – विदुरो के घरो में रहा हू मै।
मस्जिदो में रहा हूं मै
मन्दिरो में रहा हूं मै।
ना मुझे भाये ढोंगी मुल्ला और पण्डित,
मोहब्ब्त के रहबरो में रहा हू मै।
कभी रूठा हू मै रूकमणि से,
तो कभी मीरा के अधरो में रहा हूं मै।
लोग कहते है नारायण मुझको,
मगर हमेशा नरो में रहा हू मै।
मस्जिदो में रहा हूं मै
मन्दिरो में रहा हूं मै।

डॉ रविन्द्र कुमार

One Response

  1. Kumar Ravindra 22/12/2014