सूर्य शीघ्रता से सोते ही जा रहा

संध्या हो रही, दिन बीत रहा है
अपने घोंसलों की ओर पक्षी उड़ आ रहें
तटहीन जलधि पार कर लौट रहें हैं
प्रतीत होता है तू भी होगा झुण्ड में
मैं गृह-द्वार पर प्रतीक्षा में ही बैठा हूँ
क्षण-क्षण की घड़ी विलंब न कर
सूर्य शीघ्रता से सोते ही जा रहा
निशी हो गयी, मन रो पड़ा टूटकर
कोई नहीं आया, मेरा कोई नहीं
जग का सम्पूर्ण प्रेम आडंबर है
हे ईश्वर! ये मैं क्या देख रहा?
मेरे घर का दीपक स्वतः जल उठा है
देवालय की थाली में मुरझाया मंजरी था
लगता है फूलवारी से अभी किसी ने लाया
भले ही तेरे पग्-ध्वनि की हलचल न हुई
मुझे कहने दे “तू था आया, तू था आया”

– नीरज सारंग

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  1. Neeraj Sarang 04/11/2014