मज़हब नहीं सिखाता

मज़हब के नाम पे, मारा कभी किसी को,
किसी की लूटी आबरू, जलाया किसी को,
किसी को दफ़्न जिंदा, तो किसी को है डुबाया,
किसी को कर के नंगा, सरेआम है भगाया,
हुआ ये सब बहुत है, फिर भी हैं गा रहे सब,
मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना।

किसी की कोख को, उजाड़ा कोख में ही,
बुझाया बिना फूंके, किसी घर के चिराग को,
किसी की रोज़ी गयी, किसी की गयी है रोटी,
वो मजहबों के मालिक, नोच रहें हैं बोटी,
हुआ बहुत गलत है, फिर भी हैं गा रहे सब,
मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना।

अगर कहीं जो तू है, तो सुन ऐ ऊपर वाले,
अगर तुझे है आना, तो अब यही समय है,
आ और बता दे, इस मज़हबी जहां को,
तूने भी नहीं था सोचा, ऐसी दुर्दशा को।
है सच ये की नहीं, बताना तुझे ही होगा अब,
मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना।

2 Comments

  1. अरुण जी अग्रवाल 24/10/2014
    • जितेन्द्र 24/10/2014

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