मर्ज-ए-इश्क

कोई दुआ न छोड़ी, और दवा भी,
बदला जीने का ढंग और आबो-हवा भी,
पता नहीं क्यूँ ये मर्ज ठीक नहीं होता,
इसे चाहिए शायद तू और तेरी वफ़ा भी।

हरसूं करूँ कोशिश तेरे अक्स को जहन से भुलाने की,
और पक्का तेरा वजूद मेरी यादों में हो जाता है,
कुछ तो किया काला जादू तूने है जरुर,
मुकम्मल है तेरा चेहरा मेरी यादों में, और अदा भी।

2 Comments

  1. Sandeep Jagtap 21/10/2014
    • जितेन्द्र 24/10/2014

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