अश्क

लिखु तो क्या लिखु,
अपनी दस्तान अश्कोंसे,
मिट जाते हे दर्द-ए-निशा
बे-जुबान अश्कों से

अपनी आंखे सजाऊ
उसकी यादो को छुपाकर
तो बेहजाती हे हर याद
इन बे-रंग अश्कों से,

लब्जो मे उतारु
ख्वाबो को उसके,
तो मिट जाती हे हर फरमायीश.
इन गुमनाम अश्कों से,

हकीकत मे सवारू
चाहत को उसकी,
तो पिघल जाती हे आशिक़ी
इंतजार की अश्कों से,

या खुदा लीखु तो क्या लिखु दस्ता इन अश्कों से,
इस दिल मे सब बिखर जाता हे इन बे-जान अश्कों से ॥

-संदीप जगताप

4 Comments

  1. deepu 11/10/2014
    • Sandeep Jagtap 12/10/2014
  2. अरुण जी अग्रवाल 13/10/2014
    • Sandeep Jagtap 22/10/2014

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