मिटटी – डी. के. निवातिया

मिटटी***जीवन का सार है,उत्पत्ति का आधार हैजल हो या वायुसंपूर्ण जगत की प्राण है मिटटी !!अम्बर को शीश धारे,प्रकृति को सीने पे वारेरवि की अग्न,चन्द्र की चुभनप्रेम से सहती ये मिटटी !!तुझमे बसतें राम-कृष्णा,तुझमे नानक, ईसा, रहीमकण-कण मिलकर देह रचेंऐसा अनमोल रत्न है मिटटी !!तुझसे जंगल, खेत-खलिहान,वन तुझसे, पर्वत-पहाड़जिस पर बहती गंगा यमुना,अतुलनीय भार सहती ये मिटटी !!अन्न-धन सब पाते तुझसे,सहती सबका भार अतुल्यबिन प्रलोभन प्राणी जगत काकरती पालनहार ये मिटटी !!तुझ से बनता है जीवनतुझमे ही सिमटकर रह जाता है“धर्म” ने माथे तिलक लगाकरकिया शत-शत नमन तुमको मिटटी !!—–डी. के. निवातिया—-

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6 Comments

  1. अंजली यादव Anjali yadav 14/08/2018
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 20/09/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 16/08/2018
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 20/09/2018
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/08/2018
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 20/09/2018

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