मगर के जबड़े में

1-
मगर के जबड़े में
फंसी है दुनियां,
अब न निकलेगी
प्रलय से पहले,
लपेटे हैं तन से
स्वार्थ के साए,
निकालोगे कैसे
कुछ तो बताओ?

2-
सच तो ये था
सच तो वो था,
सच को मैंने
चखा नहीं था,
जो जो सच मेरे
सामने आए,
सच मानो मैं
ज़िन्दा नहीं था,
आत्मा मेरी
जिस्म छोड़ गई,
हिलकी ह्रदय
अन्दर बँध गई,
आत्मा तड़पी
मैं भी तड़पा,
मन को मेरे
चैन नहीं था।

3-
वीरानी-पसंद है मर्द की
फितरत किसलिए,
औरत सजा लाता है
जिन्दगी के लिए,
औरत ही है जो महाभारत
रचा देती है,
महकते फूलों से
खन्जर उगा देती है।

4-
आने वाला कल क्या देखो
आने वाले कल में भी,
खन्जर का व्यापार चलेगा
होगी खूं की होली भी,
कोई नहीं जो घर से निकले
बंदूकों के साये में,
जुर्म की लाठी भेद न माने
अपने और पराए में।

5-
हमसे न कहो बात वो
कितनी खराब थी,
कल तुम्हारे हाथ में
साहिब शराब थी,
गर कहो तो घर रखूं
मटका शराब का,
कल कहीं कहने लगो
वाकई खराब थी।

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