दरीचे को मालूम मिजाज

1-
दरीचे को मालुम मिज़ाज
मौसम का क्या है,
सिकुड़ती है तंग गली ओ
फिसलता जहां है.
समझती है जालिम
झुका है लेने को बोसा,
बदनसीब गली की ऐसी
किस्मत कहां है?

2-
होकर बदहवास जो
गुजरा गली से मेरी,
मैँ ये समझी मेरा
पैगाम हो कोई,
नाहक बदनाम हुई
जिसके नाम पे कि जिसने,
कहा खंजर से
इस गली तेरा नाम हो कोई।

3-
वादा खुल्द का ओ
हक दोज़ख का नहीं,
शहरग पे जमीं गर्द
खूं करेगा कैसे?
गर पड़ी जरूरत तो
क्या जबाब देगा आखिर?
बयां हकीकत सितम की
करेगा कैसे?

4-
आतिशकदां न कर
अंगुश्ते-रंगे-हिना,
क़ाफ़िर नहीं मैं
इबादत हूँ क़ाफ़िर,
खोजती हूँ जिन्दगी
सरपरस्ती में तुम्हारी,
वादा-ए-उल्फ़त की
शिकायत हूँ क़ाफ़िर।

5-
बैठा हूँ दरीचे कि तुम
गुजरो गली से,
दिल को न सही
तसल्ली निगाह को होगी,
ख्वाबे-तसव्वुर तेरा
नींद को ही न मालूम,
दास्ताने-दर्दे-जख्म
मेरी आह को होगी।

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  1. Sandeep Singh 17/09/2014

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