ओस की बूँद

पत्ति के बीचों-बीच,
बैठी है यूँ इक ओस की बूँद,
जैसे नयी नवेली दुल्हन बैठे
सेज पर पलकों को मूँद

चौंक जाती है दरवाजे की हर आहट पर,
समेट लेती है खुद को वो घबराकर,

गिनती है अपनी बची-कुची साँसों को,
बुझ जाएंगी जो सूरज के निकलते ही,
नहीं है अपने शन भंगुर अस्तित्व का
उसे कोई भी ग़म,
आज अदृश्य हो भी जाए,
कल फिर होगी पत्ती इसी ओस से नम…..

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