‘फूल चढ़ाने आया’

घायल माँ की तस्वीर न हो फूल चढ़ाने आया हूँ?
वह गीत सुनाने आया प्रियतम् गुन गाने आया हूँ।
नव जवान बेटों से मिल-जुलડ खेल रहा खूनी होली?
झोपड़ियों का चारण देख-देख आँसू बहाने आया हूँ।
जनता के पैसे, आँसू पोछ रहे मिलजुल डोली टोली,
कहा! बनेगा मंदिर-मस्जिद बोली जाती अब बोली।
झोपड़ियो से आसु की आहट पलती रहती बम-गोली,
धरती खून से लथपथ होती खेली जाती खून की होली।
बिटिया के माथे की बिंदिया मुरझायेगी सूखी – खोली,
पूषा के दामन पर जब तक होती रहेगी खून की होली।
जब तक पिजरे में बंद रहेंगे कोमल कोयल की बोली,
घायल होता तब तक”मंगल” जन गण मन की बोली॥
शब्दार्थ:-पूषा-पृथवी, धरती। लथपथ- भीग कर तर होना। गुन- गुण।
चारण-कीर्ति गायक, घूमने वाला मनुष्य,भाट।आसु-शीघ्र,जल्दी।

2 Comments

  1. sukhmangal singh 13/08/2017
  2. sukhmangal singh 13/08/2017

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