चलो झूम के दोनों बरसेंगे

चलो झूम के दोनों बरसेंगे…
दस्तक दी जब सावन ने,
मौसम के दरवाजे पर,
मन ही मन मुस्काई बहार,
इठलाकर और शरमाकर…

देख खुद को आईने में,
लगी वो करने सोलह सिंगार,
काले बदरा, बहके बदरा,
चली पहन वो मस्त फुहार…

दरवाजे तक चलते चलते,
सोची, सावन को यूँ न आने दूँगी,
पल-पल इंतज़ार किया है मैंने,
थोड़ा रूठूंगी, फिर मानूंगी…

द्वारे पर खड़ा सावन, बोला,
अब के बरस दे दो माफ़ी,
माना कर दी है थोड़ी देर मैंने,
आ गया हूँ, ये क्या नहीं है काफी…

जानती हो जब मेरे मन की बात,
क्यों नहीं दे देती हाथों में हाथ,
और कब तक हम तुम तरसेंगे,
चलो झूम के दोनों बरसेंगे,
चलो झूम के दोनों बरसेंगे…

2 Comments

  1. राकेश कुमार 21/06/2014
    • Garima Mishra 17/03/2017

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