ग़ज़ल बोलने लगी

 

एक  रात  मुझसे मेरी  ग़ज़ल बोलने लगी

जीवन के दर्द की गाँठ खोलने लगी

 

अथाह  समुन्दर  में  ले  टूटी सी एक नाव

मझधार  में  हिम्मत  को मेरी तौलने लगी

 

युगों से जो निर्मल थी मेरे मन की ये गंगा

आसुओं की धार उसमें आज घोलने लगी

 

मैंने कहा मेरी  ग़ज़ल हिम्मत न हार तूं

जब-जब जगे हैं हम तो मही डोलने लगी

 

मेरी ग़ज़ल तू क्या नहीं अपने को है पहचान

बाहुओं के अपने बल को तब टटोलने लगी.

2 Comments

  1. Dr Jai 03/11/2013
  2. Rinki Raut 03/11/2013

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