चन्द्र-ग्रहण

चन्द्र-ग्रहण
कभी खुद पे, कभी अपनी गुस्ताख़ नज़र पे तरस आता है;
देखता तुम्हें हूं, और, औरत जात पे तरस आता है,
बेग़ैरत शराब है या शबाब,
आज दोनों की ही औकात पे तरस आता है।

तेरे रुख पर तेरे रुखसार का निखार देखता हूँ,
तेरी शर्म-आलूदा निगाहों में, शराब का खुमार देखता हूँ।
माफ करना मेरी गुस्ताख निगाहों को,
तेरी शोख चंचल अदाओं पर, नशे का आसार देखता  हूँ ।
नशे में बेसुध पड़ी रही तुम,
तुम्हारे गोरे मरमरी बाहों पर चूडि़यों के निशान देखता हूँ।
नींद और नशे से बोझिल तेरी हरकतें ,
और दुपट्टे से तेरे यौवन के हर राज छिपाने का अदाँज  देखता हूँ।
लड़खड़ाते कदमों से अपने आपको संभालना
कभी अर्शे-ए-नूर थीं तुम, आज नशे के फर्श पर गर्क तेरा यह अंजाम,
तुम्हारे जीवन का मैं आज सूरते- हाल देखता हूँ।
बचपन की सखियाँ छूट गई, घर के रिश्ते रूठ गये,
अनजाने शहर मे अनजानी नौकरी,
और अनजाने मालिक का दिया उपहार, यह मकान देखता हूँ।
मेरा क्या, बचपन से लड़कपन तक, दोस्त था मैं तेरा, था तेरा हमराज,
कई बार रूठे मनाये, फिर भी प्यार रहा आबाद,
तेरे आंसुओं को पोछने का हक था मुझे; था, हर खुशी में गले लगाने का;
मगर, तुम्हे यह क्या रस्ता सूझा,
नशा और शबाब को, जरिया कमाई का बनाने का,
आज तुम्हारे अंदर तुम्हें नहीं किसी बाज़ार का इश्तहार देखता हूँ।
पढ़ी लिखी होशियार थी तुम,घर ख़ानदान से इज्ज़तदार,
फिर किसने जिम्मा उठाया, तुम्हे इस औकात में  लाने का,
आज तुम्हारे अंदर बैठे, उस शैतान का अवतार देखता हूँ।
बदनसीब हूँ,
आज तुम्हारी खाक मे मिलती जिंदगी का बनता हुआ मज़ार देखता हूँ,
लग गया है  चाँद  जैसे हुस्न पर दाग नशे के ग्रहण का,
आज तुम्हे नहीं, तुम्हारी जिंदगी का बुझता चिराग़ देखता हूँ।

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  1. gopi 21/10/2013

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