मेरे शब्द रूठे है

कुछ लिख नहीं पाने की बेबसी

शब्द खो जाने की उलझन सी
भीतर के अरमान टूट  है
मेरे शब्द मुझसे रूठे है
ये मेरा जो सहारा था
मेरे शब्दों ने जिसे गरोंदे में ढला था
वो सब बिखर गए
पानी के धार में बह गए
अब सिर्फ मैं, एक खली पन्ना
नीली सियाही बची है
मेरे संग कल तक थी जो
मेरे मान का रंग थी जो
वो मेरी कविता मुझसे रूठी है
ये भी इंसानों की तरह झूठी है
लेखक: रिंकी

6 Comments

  1. nitesh singh 14/10/2013
    • Rinki Raut 21/10/2013
  2. Rudra Pratap Singh 29/11/2013
    • Rinki Raut 29/11/2013
  3. sunil kumar lohamrod 24/01/2014
    • Rinki Raut 24/01/2014

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