“हाँ तोड़ती पत्थर”

पूर्ण यौवन पर दहकते भानु के अंगार
पंखुड़ी से होठ उसके शुष्क थे इस बार
प्यास से अवरुद्ध
होता था गला
घोर अंतस के तिमिर में हो विलीन
कोंचती उसकी क्षुधा साकार
संगीतमय शाश्वत श्रमिक की सहचरी संग
बज रहे सुर ताल लय में
कर्म स्वर अनुसार
प्रकृति सम दायित्व अंतर में समेटे
कर्मजीवी साधना रत साधिका
प्रश्न आँखों में झलकते पर विवश
यंत्रचालित भाव में गतिमान हाथों ने कहा
‘क्यों तोड़ती पत्थर|’
नयन सम्मुख छा गए अब कुछ विवश आकार
बस तोड़ती पत्थर
‘हाँ तोड़ती पत्थर|’

–इं० अम्बरीष श्रीवास्तव ‘अम्बर’

4 Comments

  1. Rinki Raut 13/10/2013
    • Ambarish Srivastava 13/10/2013
  2. Deepak Srivastava 13/10/2013
    • Ambarish Srivastava 21/10/2013

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