काहे री नलिनी तू कुमिलानी

काहे री नलिनी तू कुमिलानी।
तेरे ही नालि सरोवर पानी॥
जल में उतपति जल में बास, जल में नलिनी तोर निवास।
ना तलि तपति न ऊपरि आगि, तोर हेतु कहु कासनि लागि॥
कहे ‘कबीर जे उदकि समान, ते नहिं मुए हमारे जान।

2 Comments

  1. Prabhat Maurya 29/09/2019
  2. Prabhat Maurya 29/09/2019

Leave a Reply