शिव स्तुति

हार गया मैं शंकर मेरे, अब तो सर पर हाथ धरो,
नाथ हुआ मैं चूर थक कर, नाव हमारी पार करो।।

कोई नहीं अपना धरा पर, आप संभालो अब पथ पर,
गिर रहा लड़खड़ा कर राह में, नाथ संभालो कर धर कर।।

सब ओर घिरा हूँ आशुतोष, अब बचने का उपाय नहीं बाकी,
स्वजन गए छोड़ राह में, छोड़ गए जीवनपथ पर एकाकी।।

गिरिजापति घिर गया हूँ, बचाओ जीवन के जंजालो से,
त्रिपुरारी, त्रिनेत्रधारी दो उजाला, त्रिनेत्र से उठती ज्वालों से।।

हर और स्वार्थों के घेरे, डाले निराशा ने डेरे,
अब तेज तुम्हारा दो भगवन, कमजोर पड़ रहा चंचल मन।।

चित्त में चंचलता दौड़ रही, तुमसे बलात मन मोड़ रही,
भावना की कच्ची जड़ों को, बालपन में ही ये तोड़ रही।।

कुछ उपाय करो हे नाथ हरिहर, शरण तुम्हारी पड़ा जमीं पर,
खंडित हुआ विश्वास प्रभुजी, नए शिरे से अब प्राण भरो।।

हे नाथ बचाओ अब मुझको, चहुं ओर छूटे स्वार्थों के शर,
हे उमाकांत रखलो पत, अब बात बिगड़ती जाती है।।

हे शशिशेखर सम्बन्धो की, अब बखिया उधड़ी जाती है,
हे नीलकंठ अब तो, सपनों की कश्ती डूबी जाती है।।

भोलेनाथ हे नाथ दिगंबर, बचालो मुझको मेरे सम्बन्धों को,
हे महादेव, भव, भीम, सर्वज्ञ, बचालो अपने इस अक्ल के अंधे को।
हे व्योमकेश, शम्भू-शंकर, बचालो अपने कुमार इस बंदे को।।

अगर आपको मेरी ये प्रार्थना अछी लगे तो कृपया इसके 11 पाठ जरूर करें।
धन्यवाद।

मनोज चारण
मो. 9414582964

shanker511

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