ये साँझ का धुंधलका ….

 

कोहरा तो नहीं है मगर

कुछ उस जैसा ही ठंडा और गीला है

ये साँझ का धुंधलका…

 

हौले-हौले गहराता

वक्त की देगची में रंगता

आसमानी दुपट्टा….

और उस  पर

पल-पल निखरता

चाँद का झीना-छितरा वजूद….

 

मन की अँगीठी में आँच नहीं की अब तक ???

कुछ धुआँ उठ्ठे तो आँख में नमी आए….

कोयला खत्म तो नहीं हुआ…

जल रहा है शायद कहीं और

किसी और की आँच में ???

या अब भी इंतज़ार है इसे

उस फूँक का

जो सदियों पहले

स्वाह कर गई इसे ??

 

अपनी ही कालिख में

मुँह छुपाये सिसक रहा है

रंग बदल-बदल….

ठीक वैसे ही जैसे

ये साँझ का धुंधलका !!!.

……

अंजु वर्मा

साँझ का धुंधलका

9 Comments

  1. yashodadigvijay4 06/09/2013
    • Anju Varma 06/09/2013
  2. Deepak Srivastava 07/09/2013
    • Anju Varma 07/09/2013
  3. सौरभ प्रसाद 07/09/2013
    • Anju Varma 07/09/2013
  4. siv prasad verma 10/09/2013
    • Anju Varma 13/09/2013
  5. अरुण जी अग्रवाल 29/10/2014

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