बस और नहीं

क्या-क्या बताएं कहते हैं हर बात की एक सीमा होती है,
और जब सीमा पार हो जाए तो फिर कहना पड़ता है
“बस और नहीं” (BAN).

मंत्री की कमाई
बाबु की ढीलाई
कमर तोड़ महंगाई
“बस और नहीं”

सरकारी बहाने
इनके फ़साने
वही किस्से पुराने
“बस और नहीं”

मूर्खों की मर्जी
अदालत में अर्जी
मुठभेड़ भी फर्जी
“बस और नहीं”

यह झूठी शान
कुटिल मुस्कान
खुदकुशी करते किसान
“बस और नहीं”

रहनुमाओं का घोटाला
निठारी का नाला
ओर मुंह पर ताला
“बस और नहीं”

गैरों के संग
अपनों से जंग
रंग में भंग
“बस और नहीं”

दुश्मनों की ध्वजा
जालिमों को मजा
बेगुनाहों को सजा
“बस और नहीं”

जटायु का मरण
दुर्योधन संग करण
द्रौपदी चीर हरण
“बस और नहीं”

धुंधली तस्वीर
बिगडती तकदीर
ओर बिकता जमीर
“बस और नहीं”

दामिनी की इज्ज़त
सबकी मिली भगत
देश की फजीहत
“बस और नहीं”

चीन का कीड़ा
पाक की क्रीड़ा
काश्मीर की पीड़ा
“बस और नहीं”

जानकी बनवास
जनता उदास
टूटती आस
“बस और नहीं”

गुलामी की यादे
भयानक इरादे
झूठे ढाढस झूठे वादे
“बस और नहीं”

आहों का अमन
घावों का चमन
देश का काला धन
“बस और नहीं”

शहीदों को चिताएं
नेताओं को मालाएँ
और क्या-क्या बताएं
“बस और नहीं”

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गुरचरन मेह्ता 

4 Comments

  1. Tushar Raj Rastogi 30/06/2013
    • Gurcharan Mehta 30/06/2013
  2. kalyan 04/07/2013
    • Gurcharan Mehta 06/07/2013

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