“मोहब्बत”

तन्हाई से जो नाता है कहीं वो टूट ना जाये,

सन्नाटे के तरन्नुम का ये दामन छूट ना जाये।

 

मोहब्बत की जो आंधी है, मेरे दिल को डराती है,

सुकूने-आशियाँ मेरा हवाओं में न उड़ जाये।

 

जिधर देखो उधर पायल के घुँघरू शोर करते हैं,

तन्हाई की सरगम के कहीं सुर खो नहीं जायें।

 

अकेला था तो अपना था, था मेरा दिल हिफाज़त से,

उन्हें क्या कद्र इस दिल की, कहीं पर छोड़ ना आयें।

 

बड़े बेखौफ़ आशिक़ हम, बड़ी बेदर्द माशूक़ा,

उसे समझाएं भी कैसे जो खुद मिटने चला जाये।

 

कभी सुनते थे किस्से कैज़ के, फ़रहाद, मजनू के,

हमें डर है कहीं ना साथ इनके हम गिने जायें।

 

 

–         हिमांशु

 

2 Comments

  1. SUHANATA SHIKAN 06/06/2013
    • Himanshu Srivastava 07/06/2013

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