माँ

विविध रूप तेरे जीवन के,
हमें मातु छवि प्यारी है।
जीवन खिलता वहीँ जहाँ पर,
माँ तेरी फुलवारी है।।

हम तो तेरे नव-अंकुर हैं,
माँ तुम हो वटवृक्ष सघन।
धूप-ताप-घन-मेघ सहे पर,
शीतल जैसे हो चन्दन।
होंगे वृक्ष अनेकों जग में,
छाँव तुम्हारी न्यारी है।
जीवन खिलता वहीँ जहाँ पर,
माँ तेरी फुलवारी है।। 1।।

माँ तेरे श्री वचनों में है,
सार वेद औ ग्रंथों का,
तुम प्रकाश हो प्रेम-ज्ञान का,
अनगिन दीपों-पंथों का।
रोपो हमें वहीँ पर माता,
जहाँ तुम्हारी क्यारी है।
जीवन खिलता वहीँ जहाँ पर,
माँ तेरी फुलवारी है।। 2।।

— दीपक श्रीवास्तव
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  1. Krishna Kumar Jha 27/04/2013

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