उम्र जो बढ़ी

उम्र जो बढ़ी

बढ़ा जोश उनका
कुछ पद था
कुछ पैसे का बल

माता पिता की
थी अपनी दुनिया
लड़खड़ाती
हाथों  में ले के  प्याले

गाड़ी पैसा दे
छोड़ दिया जीने को
मनमानी को
उम्र  कच्ची उनकी

बहके पग
थरथराई साँसें
खोया होश भी
नव जीव आने का

संकेत मिला
होश में आये जब
सब था लुटा
लोकलाज का डर

भविष्य –  चिन्ता
बोला, पैसा -रुतबा l
आज फिर से
कूड़े के ढेर पर
गिद्ध मँडराते हैं  ।

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  1. CB Singh 15/12/2012

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