स्वयं से छल न होगा

स्वयं से छल न होगा !

रीत को ही प्रीत कहना
क्या स्वयं से छल न होगा
मन में उठते उस बवंडर को
चाहकर गर रोक ले तो
मन को अपने खुद ही छलना
क्या स्वयं से छल ना होगा
उस तमस में बैठते सब
मैं अगर पहुँचा वहाँ तो
रोक लँूगा बढ़ स्वयं को
थामना कदमों को अपने
क्या स्वयं से छल न होगा

पाप को तो पाप हमने ही कहा है
पुण्य को हम पाप कहते डर रहें हैृं
उन परम्पराओं का निर्वाह हो जरुरी
जो है भारी मानवी सुख के लिए सब
रोकना स्वये को विद्रोह से, बन महात्मा
क्या स्वयं से छल न होगा
मैं को मैं कहते डरे तो
कागजी किस्से में उलझे रहें हम
आशाओं की कह लम्बी कहानी
निराशा को गड्ढे में गाड देना
अपनी मंजिल को पा के पीछेग को मुडना
क्या स्वयं से छल न होगा
राग में जो प्रीत को सच्ची बताते
द्वेष करते क्यूँ कुटिलता से भरें हैं
लादे हैक् आदर्श को जाने बिना ही
स्वयं को विनाश गर्त में दबा रहें है
कर तपस्या पा सकें कब हम बिधाता
कर्म करते क्यूँ अघाते से रहें है
बांधकर स्ययं को बेजान गुरुरज्जु से
टूटकर बह जाये सारे द्वंद्व मन के
जिन द्वंद्वों को पालना मुश्किल भरा था
पालकर यूं छोड़ देना छल न होगा
मैं रहा कब तक उदासी के दिनों में
भूल जाना उन दिनों को छल न होगा
आग की बातें ताक लम्बी बहुत है
आग पर पानी छिडकना छल न होगा
भाग्य को बैठे दबोचे आज तक हम
कर्म पथ का छोडते जाते अकिंचन
उस मरुभूमि को कब छोडेगें हम सब,
जो है सूखी
क्या यूं ही स्वयं को मिटाना छल न होगा
आजकल की बात ये है सब पुरानी
बीत जाती है असफल जिन्दगानी
जब थे चंगे फैलकर सोते रहे हैं
क्यूं सच की परछाई को छूते नहीं हम
सच की बातें बडी करते रहें हैं
दिल में लाखोें तमन्नाओं को मारें
धूमिल स्वयं की छवि स्वयं कर चले हैं
वेगवती धाराशायी वो रंजमयी उदाय भाषा
मौन को क्यूं खोखला लिबास पहनाते फिरे हैं
रुह को हम आत्मा और आत्मा को रुह कहकर
खुद को बस एक देह या जिस्म बतलाते रहें हैं
है तडप इस जिंदगी की जो ढली है शाम सी फिर
अपने भावों को दबाकर झूठा-झूठा जी रहें हैं
अपनापन खुद छीन लेना
क्या स्वयं छल न होगा!

-सत्येन्द्र कात्यायन,khatauli , muzaffarnagr(u.p.)

2 Comments

  1. सत्येन्द्र प्रताप सिह 10/03/2014
    • satyendra katyayan 19/11/2015

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