तलाश

एक भीड़ के संग चल रही थी
अनजाने पथ पर बढ़ रही थी
एक कश्मकश में पड़ी थी,

मेरी मंजिल की जाने राह कहाँ थी

आशा की किरणों की खलिश में
अपने ही उमीदों की तपिश में
हर पल बस मै जल रही थी,
पर मेरी ख्वाइशों की सीमा नहीं थी

अपने वजूद को नजरें तलाश रही थी
खुद के होने का सबूत मांग रही थी
एहसास होने लगा तब ,
महफ़िल में मेरी पहचान नहीं थी

– प्रीती श्रीवास्तव

2 Comments

  1. ganesh dutt 09/04/2013
  2. Preety Srivastava 10/04/2013

Leave a Reply