तुम्हारी आवाज़ पे

तुम्हारी आवाज़ पे ठहर जाता हूँ
ख़ामोश निगाहों से डर जाता हूँ
 
तुम्हारे होने का एहसास ही तो है
तुम ही तुम हो  जिधर जाता हूँ
 
दरवाज़े पे दस्तक सुकूँ दे रही  है
हर-बार उम्मीद से भर जाता हूँ
 
होंठों की हंसी हो या आवाज़ शीरीनी 
हर  एक अदा  पे मर  जाता  हूँ
 
मुझे पता   है वहाँ  तुम नहीं  हो
मै उन्ही गलियों में मगर जाता हूँ 
 
क्या तेरा रास्ता क्या मेरा रास्ता 
हो जहाँ सुकूँ मै गुज़र जाता हूँ
 
तुम अपनी पेशानी पे ज़ोर न दो
सिलवटें देखकर मै सिंहर जाता हूँ

2 Comments

  1. sangeeta swarup 03/10/2012
    • नादिर 03/10/2012

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