हाइकु (धरा दुःखी)

          धरा दुःखी

                     (हाइकु)

1)
धरा उठ जा,
नींद को तोड़ अब
रूप देखना।
2)
अलसायी हो,
मुरझाई सी बात
अब तो कुछ बोल।
3)
दिनकर भी,
उठ चढ़ा कर से
उजाला लिए।
4)
खगों की गूँज,
जग में कोलाहल
उड़ते हुए।
5)
सो रही अरि,
देख ले आताप को
सो रही अभी।
6)
मौन क्यों रही,
क्या बात हो गयी
तू क्यों रो रही।
7)
फूल भी उठा,
हँसे खिलते हुए
भौंरे घूमते।
8)
बात मचली,
ख़ुद बहाते हुए
नमी छोड़ती।
9)
कृषक खेत,
पर मग्न हो गए
स्वेद छोड़ते।
10)
हर लगा है,
दुःख को भूल के
मरता हुआ।
11)
चक्र चलता,
यहाँ बढ़े ज़ोर से
समझी नहीं।
12)
प्रदूषण है,
रोई धरा फैलता
अभिशाप है।
13)
काया सिमटी,
ओजोन पर्त फ़टी
छलनी कटी।
14)
गिलेशियर
हैं फटते उष्ण से
भागने लगे।
15)
कुछ न किया,
मैं ख़ामोश देखती
हृदय हिला।
16)
अन्धी हुई मैं,
देखकर परेशान
आंखें हैं कढ़ी।
17)
दाँत तोड़ते,
उत्पात करते सभी
कहाँ छोड़ते।
18)
जग की माँ,
संज्ञान मेरा कर्म
हृदय जले।
19)
जागो उठो तो,
न मरेगा व्यर्थ तू
हे कहाँ बचे।
20)
वृक्ष तू लगा,
पर्यावरण बचा
तो जग हरा।
21)
जल को भरा,
एकत्र कर धरा
जीवन बढ़ा।
22)
नारा सभी का,
लाज धरा की बचा
अब जाग जा।
-सर्वेश कुमार मारुत

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