शायरी अरूण कुमार झा बिट्टू

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अपने दोस्त थोड़े कम ही बनते है
क्योंकि हम जुबां के सच्चे हैं हजूर
मिटना हो तो मिट भी जाते हैं ।
क्योंकि हम वसूलो के पक्के हैं हजूर।

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वो मुझे कहता हैं जीने नही दूंगा
भोले उसको पता ये बात नही हैं ।
तू करने वाला हैं जग का संचालक
उसको पता अपनी औकात नही हैं।

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आज एक एकतेफाक मेरे साथ हुई
वर्षो बाद एक मोड़ पे उनसे मुलाकात हुई
जो करते थे बाते तमाम दिल के मिल कर
आज पहली बार सिर्फ नजरो से बात हुई।

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चाहे किस्से लबों से बिसर जाते हैं।
वो जीवन से चाहे निकल जाते हैं
पर वो छाप मुहब्बत का ऐसा हैं हजूर
जो ता उम्र दिल पे ठहर जाते हैं।

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छोर दिया दिलों से जुड़ना हजूर
अब सिर्फ हम जिस्म की आस करते हैं
तुम हो तो ठीक नही तो बोलो हजूर
हम किसी और से बात करते हैं ।

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किस्मत में नही हो तुम मेरे तो क्या
हम तुम से कब बिछड़ पाएंगे
तुम राधे के पद चिन्हों पर चलना
हम गिरधर सम जीते जायेंगे ।

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