गर – शिशिर मधुकर

टूटेंगे धागे ये नकली बंधन नहीं प्यार के गर
पांवों में छाले पड़ेंगे रस्ते मिलें खार के गर

यूं ही तो मिलता नहीं है देखो खुदा जिंदगी में
एक दिन मिलेगा तुम्हें वो पागल हो दीदार के गर

जलता बदन तप रहा है नफरत के शोले जमा हैं
दिल को सुकूं कुछ मिलेगा छीटें हों बौछार के गर

यूं तो दुकानें सजी हैं हर चीज बिकती है लेकिन
क्या कीजिए ना हो सामां काबिल तलबगार के गर

ठगता है ज्यादा भरोसा चल तू संभल के ए मधुकर
वादे हों झूठे तो क्या हो तेरे मददगार के गर

शिशिर मधुकर

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