परवाह – शिशिर मधुकर

सोच के क्या क्या चले थे जिंदगी की राह में
अब कहां आसूं निकलते हैं किसी की आह में

देखते ही देखते बदला है लोगों का मिजाज
अब धड़कता ही नहीं है दिल किसी की चाह में

हर तरफ बेचैनियां हैं और चेहरे फक्क है
अब कोई जादू नहीं दिखता किसी निगाह में

ये भी कोई जिंदगी है जिसमें कोई भी नहीं
जो गुजारे खुद का हर लम्हा फकत परवाह में

नफरतों के दौर में ढूंढे कहां पे दोस्ती
अब नहीं लेता किसी को कोई भी पनाह में

शिशिर मधुकर

Leave a Reply