नारी भेद।

नारी भेद चेत रहा था मुझमें
क्या फर्क है जो पुरुषार्थ नहीं तुझमें
नयनों से न नीर बहावे
दया प्रेम त्याग दिखावे
क्या जिवन तेरा है मुझमें
नारी भेद चेत रहा था मुझमें

घर आंगन की किलकारी कैसे
सीता सती की कब प्यारी किसमें
पुरुष में पुरुषार्थ जगावे
सुंदर स्वरूप जगत सुंदरी सब बस जावे
क्या कल्पित है रावण भी तूझमें
नारी भेद चेत रहा था मुझमें

माता पुत्री बन करुणा बिखरावे
लक्ष्मीबाई सी शस्त्र चलावे
घर की लक्ष्मी अंतरिक्ष की कल्पना बन जावे
नारी भेद है सहनशीलता वा तेज है
घर से देश तक कदम बढ़ावे
कोई न इसके दूज्य है इसमें
नारी भेद चेत रहा था मुझमें

2 Comments

  1. ashutosh 12/09/2021
    • rashmidelhi 14/09/2021

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