खुशबू

बगीचा महका खुशबू से
फूल बड़े इतराए
अपने गुणों की खातिर ये
सबके मन को भाए

खुशबू से पहचान है इनकी
खुशबू ही जान कहलाए
यही अगर निकल जाए इनकी
तो ये भी हैं मुरझाए

ईश्वर भी चाहे जिसको
वे फूल ही सबको महकाएं
खुशबू से ही भर दें उसको
जिससे उसको सब अपनाएं

निराली है खुशबू जिसकी
कभी कांटों में दिख जाए
जैसे बच्चा मां के अपनी
आंचल में छिप जाए

कांटे संकेत करते हमको
इनको न ले जाएं
ये हैं सदस्य हमारे देखो
इनसे ही हम जी पाएं
………………………………………..
देवेश दीक्षित

 

Leave a Reply