सूनी सड़क

सूनी सड़क है
पर चले जा रहा हूं

राही खुद ही
बने जा रहा हूं

मंजिल की ओर देखता
बढ़े जा रहा हूं

पैर के छालों को अपने
देखता जा रहा हूं

राही मिला नहीं दूसरा
विचलित हुए जा रहा हूं

कैसे कहूं मैं
डरे जा रहा हूं

मंजिल मिलेगी मुझे
ये सोचे जा रहा हूं

इरादों को अपने
बुलंद किए जा रहा हूं
……………………………
देवेश दीक्षित

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