मन नहीं मानता……….देवेश दीक्षित 

जब तक न लिख लूं रचना
मेरा मन नहीं मानता

अकसर सोचता हूं लिखूं क्या
मैं खुद नहीं जानता

विषय मैं तलाशता रहता
एकांत में बैठा रहता

शब्दों को जोड़ता रहता
कुछ न कुछ लिखता रहता

लिखते लिखते जब बन जाती पंक्तियां
लगता ऐसे जैसे जागृत हो गई शक्तियां

उन शक्तियों का सदुपयोग मैं करता
और उन पंक्तियों को रचना में बदलता

और जब बन जाती है मेरी ये रचना
तब याद आती है वो बीती हुई घटना

कैसे मैं विचारों में खोया रहता
एकांत की तलाश में भटकता रहता

एकांत ही है मुझको तब भाता
जब शब्दों का प्रभाव मेरे दिमाग पर छाता

और जब तक न लिख लूं रचना
मेरा मन नहीं मानता
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देवेश दीक्षित

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