आत्मा बसती है मेरी……………देवेश दीक्षित 

कविता में आत्मा बसती है मेरी
बस यही एक आखिरी खूबी है मेरी
न लिखूं तो चैन मुझे आता नहीं है
इसके सिवा कुछ भाता नहीं है

लिखते रहना आदत है मेरी
नए विषय चुनना खासियत है मेरी
कभी ये विषय चुना है
तो कभी वो विषय चुना है

जब तक न लिखूं जान अटकी है मेरी
बस इसी में खूबी अटकी है मेरी
न जाने कितने विषय चुने हैं
चुन चुन कर विषय उस पर लिखे हैं

लिख कर आत्मा तृप्त होती है मेरी
जैसे जान में जान आती है मेरी
लिख कर इसको बहुत शुकून मिला है
इसको लिखना ही अब जारी सिलसिला है

जारी रहेगी कविता ये मेरी
जिसमें बसी है आत्मा ये मेरी
न टूटेगा इसका मेरा नाता
क्योंकि लिखना मुझको है भाता
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देवेश दीक्षित

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