सोचता हूं मैं फिर से बालक बन जाऊं…………..देवेश दीक्षित

सोचता हूं मैं फिर से बालक बन जाऊं

सोचता हूं मैं फिर से बालक बन जाऊं
जात पात और भेद भाव से दूर हो जाऊं
अपनी ही दुनिया में मस्त मगन हो जाऊं
और मां के आंचल में सुख की नींद सो जाऊं

नींद में जाते ही सपनों में खो जाऊं
सपनों में मां को देख मुस्कुराऊं
लोरी सुन उनकी मैं खो जाऊं
जागूं नींद से तो उनको ही पाऊं

अपनी तोतली बोली से उनको हसाऊं
अपनी अतरंगी सैतानी से उनको रिझाऊं
जब देखें वो प्यार से तो मैं भी मुस्कुराऊं
लाड़ करूं उनसे और आंचल में छुप जाऊं

जिद्द अपनी उनसे मनवाऊं
न माने तो रो के दिखाऊं
पूरा घर सर पर उठाऊं
बालक हूं जो मांगू वो पाकर दिखाऊं

सोचता हूं मैं फिर से बालक बन जाऊं
दीन दुनिया से बेखबर मां के सीने से लग जाऊं
खेल खेल कर जब मैं थक जाऊं
तब मां की गोदी में जा कर सो जाऊं
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देवेश दीक्षित

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