रक्षाबंधन – अरूण कुमार झा बिट्टू

मिठाई की दुकानों पर कतारे लगने लगी
रंग बिरंगी रखियो से बाजारे सजने लगी
बहने चली हैं आज भाईयो के द्वार
प्रेम उमड़ा हैं सबके चेहरे पे आज

भाई की कलाइयों पर रखियो का साज
माथे पर चंदन रोली अक्षत का ताज
प्रेम और विश्वास की ये डोर बंधने लगी
रहे सलामत भईया मेरा बिंतिया करने लगी।

पहली बार मां लक्ष्मी ने रक्षाबंधन मनाई थी।
राजा बलि के कलाई पर राखि की गाठ लगाई थी।
पाया भेंट में पति को हरी को वो छुड़ाई थी
जब बावन अवतारी वचन बंध बलि की दासवत पाईं थी।

इसी बंधन की मांग कृष्ण ने त्रेता युग में बढ़ाई थी
द्रोप्ति के चीर हरण को प्रभु ने विफल बनाई थी
साड़ी के एक टुकड़े से बंधे हुए गिरधारी थे।
प्रेम और विश्वास के आगे झुके सभा में सारे थे।

इसी गांठ की मान हिमायू ने मुस्लिम हो के निभाई थी
कर्मावती मेवाड़ की रानी जब रखी उसे पठाई थी
बहादुरशाह के विरुद्ध खड़ा था हिमायु की तलवार
बहन की रक्षा को सेना भेजा था मेवाड़।

आज देश के मंत्री संतरी के घर बेटी जाति हैं।
देश के रक्षक के हाथो में रखी बांध के आती हैं
बड़े धूम से मनता हैं ये देश में हर साल
प्रेम खुशी विश्वास को ये बढ़ाता हैं हर बार

हर युग में ही पाईं रखी ने बहुत ही सम्मान
भाई बहन के प्यार का हैं निर्मल ये त्योहार
आओ हम सब मिल कर ये खुशियां आज मनाए
हर बहना सुरक्षित हो ये संकल्प आज उठाए।

Leave a Reply