मैं  झूठ बोलने लगा हूँ

बचपन में सबने बोला, इक बात न भूलना,
चाहे जो हो जाए, कभी झूठ न बोलना |

धीरे-धीरे मैं फिर बड़ा होने लगा.
बचपन का सबक परे होने लगा |

अब मैं हर बात, हर इंसान को तौलने लगा हूँ,
अब बेवजह भी मैं झूठ बोलने लगा हूँ |

अक्सर लोग पूछते हैं मैं कैसा हूँ,
मैं तपाक से कहता हूँ ‘अच्छा हूँ’ |

रोज़ अपने हाल को झूठ का लिबास पहनाता हूँ,
झूठी मुस्कान तले हर सच को छुपा जाता हूँ |

मेरी खलिश, कहीं मेरे झूठ के पीछे दबी है |
इन हंसती हुयी आँखों में, कुछ कमी, कुछ नमीं है |

अब अंधेरे से मैं डरता हूं, घबराता हूँ,
पर अपने दिल की दिल मैं रखता हूं।

समझदार दुनिया की समझ को समझने लगा हूँ,
हाँ अब मैं बेवजह ही झूठ बोलने लगा हूँ |

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