डेरा।

कौन अब किसी की चौखट पर रुकता है
फुर्सत में कोई बुजुर्ग कहां चौपर में चिलम भरता है

अब तो उड़ जाते है कबूतर भी तारों भरे मकान देख कर
कहां अब किसी छज्जे पर डेरा रहता है

न तीतर न सावन के पेड़ो के झूले
कहां मेहंदिया रंग में कोई रंगता है
क्यों डरते हो चौपर बनाने से अब कौन डेरा रखता है

बस चेहरे पर सिकुड़न कंधों का झुकाव
चहचहाती रोशिनी में आहें अब कौन भरता है

मन की थकान आंखों के फरमान
चांदनी रात में डेरा अब किसका रहता है

इंसान की पहुंच पक्षी से ऊपर
जमीन पर अब कौन रहता है

डेरा तो आसमानों पर है
सबकी सब कहते हैं अपनी दिल की कहता कौन है

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