कहां रहते है वो लोग जो कहीं के नहीं रहते है

कहां रहते है वो लोग जो कहीं के नहीं रहते है
कुछ न कहकर भी वो सब कुछ कहते है

न खुद से प्यार न खुदा से करते है
जिंदगानी में जिंदगी का हर लुफ्त वो भरते है
न कौआ की तरह कहते है न नदी की तरह बहते है
कभी इधर तो किधर कभी बहती जमीं पर भी वो बैठे है
कहां है वो लोग जो कहीं के नहीं रहते है

दर-दर भटकते है कहीं घर में भी रहते है
कुछ समझते है या यूं ही कहते है
जिंदगी का तजुर्बा तो होगा उन्हें
या ऐसे ही जिंदगी से लड़ते है
कहां रहते है वो लोग जो कहीं के नहीं रहते है।

मिलना है मुझे उनसे जो दुखों से लड़ते है
हर सपनों को झकझोर कर चलते है
सिर पर कफ़न समझूं या किस्मत की रुसवाई
जमीं होते हुए भी चारो तरफ रहती है खाई।
कौन बताएगा की कहां रहते है
कहां रहते है वो लोग जो कहीं के नहीं रहते है!

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