मेरी शायरी – अरूण कुमार झा बिट्टू

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जरूरी नहीं कि जिंदगी बड़े आराम से जिया जाए
खुशनुमा सुबह खुशनुमा शाम से जिया जाए
मान तो मिलता हैं उन्हें मिलता रहेगा
जो तै कर चुके हैं ईमान से जिया जाए

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तेरे कातिल निगाहों में घुल जाना चाहता हूं
चुपके से तेरे दिल से मिल जाना चाहता हूं
एक नजर देख मुझे तेरा भी नाम होगा
मैं आज सरेआम मिट जाना चाहता हूं

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खुशियों से आंगन सजाया हैं मैने
जिंदगी को आज पाया हैं मैने
कर देंगे चुकता अरे गम के भी खाते
जगीरे मुहब्बत पाया हैं मैने।

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तू मुझे नही मिली इसमें एक राज होगा।
सुना हैं सच्ची मुहब्बत मुक्कमल नही होती।
बस ये ही बात होगा

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मैं सोच भी नही सकता
तुम इतने नीचे गिर जाओगे
दावा तो होगा मुझ से मुहब्बत का
और जिस्म किसी और पे लुटाओगे

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मुझको ये जिंदगी हसीन लग रही हैं
मखमली ये सारी जमीन लग रही हैं
आज ही बैठी हैं वो पहलू में मेरे
और अभी से वो दिल के करीब लग रहीं है।

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