तब कविता बनती है

सब कहते हैं कुछ लिखते क्यूँ नहीं |
खुद-ब-खुद तो कलम चलती नहीं |
जब जज़्बातों का प्याला हो भरा-भरा,
या ख़ुशी से मन हो हरा-हरा,
तब कविता बनती है |
कुछ मोती छलके आँखों से,
कुछ आहें हों, कुछ बाहें हों |
कभी मन हो घुटता-घुटता सा,
अँधेरे में भी छिपता सा |
जब अपनों का साथ छूटा हो,
और दिल शीशे सा टूटा हो |
तब कविता बनती है |
दिल मचले जैसे नदिया हो,
हर मंजिल, रास्ता, ज़रिया हो..
जब हँसी के फव्वारे हों,
आँखों में चाँद-सितारे हों |
लफ़्ज़ों के पैर निकलते हैं,
पन्नों पर चलने लगते हैं
तब कविता बनती है |
कभी ख़ुशी की गली में,
कभी ग़म के बाजार में,
डगर कैसी भी हो,
ख़लिश, हर्ष, प्यार में,
कविता खुद को ढूंढ लेती है
मनरूपी साग़र में गोते लगाती है,
तब कविता बनतीं है…

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