खोखला हर परवाना था।

कागज़ की हवेली पर घर किसे बसाना था
हर किसी को पता था खोखला हर परवाना था

तेज़ आंधी और तेज बारिश तो एक बहाना
सभी को एक दिन अपने घर लोट जाना था

सभी को पता था मुक्कदर भी किसी का दीवाना था
हर किसी को पता था खोखला हर परवाना था

हवाओं को भी फिजाओं का बहाना था
हर दरवाज़े पर किसी न किसी का थाना था

बंद खिड़की हो या चौकीदार
किसी चोर को तो अंदर आना था

थाना तो बस एक बहाना था
नज़र नहिं बसा उसमें तो कोई कान्हा था

समुंद्र को भी जमीन को जो पाना था
हर किसी को पता था खोखला हर परवाना था

किसी न किसी को तो पर किनारा पाना था
हर घड़ी तकलूफ किसी बेजान को उठाना था

बिन पानी के भी किसी को सो जो जाना था
बिन सपनों के भी आखिर खो जाना था

कुछ न पाकर भी सब कुछ खो जाना था
हर किसी को पता था खोखला हर परवान

घने जंगल में भी जलजला पाना था
न आग न पानी फिर भी दिलजला हो जाना था

पीतल तो पीतल सोना भी काला हो जाना था
गृहस्थ होते हुए भी वैराग्य का माला पिरो जाना था

जिसके लिए दौड़े वही खो जाना था।
हर किसी को पता था खोखला हर परवाना था।

कौआ हो या कोयल हर किसी को उड़ जाना था
जिंदगी का सलीका समझो या कोई आदत
हर किसी को किसी से न किसी से जुड़ जाना था

टूटे हुए तारों को भी आसमान तक जाना था
सुखी रोटी में भी घी पुड़ी का योग पाना था

सब कुछ पाकर भी बहुत कुछ खो जाना था
बहुत कुछ खो कर भी राह नई बन जाना था
सभी को पता था खोखला हर परवाना था।

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया 28/07/2021
    • rashmidelhi 30/07/2021
    • rashmidelhi 24/08/2021
      • डी. के. निवातिया 28/08/2021

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