चांद से बाते – अरुण कुमार झा बिट्टू

कल मुझे मेरे छत पर मिल गया था चांद
हस रहा था केह रहा था क्या खूब है इंसान
उलझनें अपनी बनाकर खुद उलझते है
हर बार तै नई शिखर कर भागते फिरते हैं

बुलबुलों के भती इनके स्वप्न के प्रकार
कभी बनते कभी फूटते मनुज के है विचार।
मुझको देखो शांत मन मै कैसा फिरता हूं
तुम मनुज के फेर का आनंद भरता हूं

मै हसा मैंने कहा बस भेद ये ही है
तुम्हे लगा जो फेर वो तो फेर नहीं है
स्वप्न के आकार में ये जग समाते है
कर्म के बाणों से हम शिखर को पाते है
कल तलक हम दूर से तुम्हे देखा करते थे।
ये स्वप्न है जो आज तुमको छू के आते हैं

ये स्वप्न के आकार में ही समाया हैं ब्रह्मांड
ये स्वप्न हैं जो कर्म को उकसाता हर इंसान
ये स्वप्न के ही बाण पर हम बढ़ते जाते है
क्या धरा सागर नभ में डगर बनाते हैं

हम से पूछो कैसा होता खुशी का हैं आनंद
तुम क्या जनो कर्म शक्ति ये तो है अनंत
इस जगत ब्रह्माण्ड को भी हम झुका देंगे
वो तुम्हारे स्वर्ग तक रास्ता बना देंगे।

हम मनुज हैं हमने केवल चलना सीखा है
उलझनों के उलझनों से निकालना सीखा है
जो सोचते हैं चाहते हैं कर ही जाते हैं
जीत की खुशी को हर हद को झुकाते हैं

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