लाल बत्ती का कारोबारी – अरुण कुमार झा बिट्टू

जरूरी नहीं कि पैसे वाले ही बड़े होते हैं
मैंने गुदरियो में भी बड़े बड़े बड़े देखे हैं
उम्र बीतती हैं पेट भर की आग बुझाने में।
पर आंखो में स्वाभिमान भरे भरे देखे हैं।

चेहरे पे थी झुड़िया बाल बिखरा हुआ था।
बेत के सहारे ही वो टीका हुआ था।
गुदरी को गरीबी ने कई बार छेदा था।
कंकाल के अपने वो ढका हुआ था

वो बत्ती पर यहां वहा चल रहा था।
दस के दो दस के दो बोल रहा था
हाथो मे पेन के चार ही पैकेट थे
पर वो मांग कर नहीं पेट की खातिर बेच रहा था।

उसे देख कर पत्थर को भी दया आ जाता
बिन मांगे ही उसको काफी मिल जाता।
मैंने देना चाहा पर उसने लिया नहीं।
उसने कहा मांग कर तो मैंने कभी जिया नहीं।

उसके इन शब्दों में एक रोस था
स्वाभिमान को जैसे लगा ठेस था।
मैंने कहा बाबा मुझे माफ़ करना
मुझको भी दस के दो पेन देना

वो बोला लो उसके शब्दो में एक रोब था
स्वाभिमान था खुशी था और जोश था
जैसे जिंदगी में सब कुछ वो जीत चुका हो
लाखो अमीरों से अमीर रहा हो
जरूरी…..

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