साँसों का बागवान

साँसों का बागवान

 

मदभरी मस्त मोहक हवा जिधर से आती है, उधर ले चलो।

महकते फूलों की खुश्बू जिधर से आती है, उधर ले चलो।

 

जानता हूँ इन साँसों का बागवान बहुत बूढ़ा है

पर सृष्टि के परम रचयिता की तरह वह बहुत भला है।

 

नाजुक तितलियाँ खुशियाँ समेटे जिधर ले जाती है, उधर ले चलो।

चिड़ियों की चहकती उड़ान, जिधर ले जाती है, उधर ले चलो।

 

वह साँसों का बागवान मन ही मन खिलखिला रहा है

वह भी खुदा की तरह मेरी याद में मुस्करा रहा है।

 

इस रात के बाद रोशनी जिधर से आती है, उधर ले चलो।

मुझे खोजती उसकी दुआ जिधर से आती है, उधर ले चलो।

 

जानता हूँ आगे की यह लंबी राह बहुत कठिन है

अपने हरएक कदम को आगे रखना बहुत जटिल है।

 

मगर अब यह थकित जिन्दगी जिधर ले जाती है, उधर ले चलो।

उसकी आवाज मुझे खींच जिधर ले जाती है, उधर ले चलो।

 

चाह है कि इस साँसों के बागवान के चरण चूम लूँ

या परम परमेश्वर की फूलमाला भी पूरी गूँथ लूँ।

 

आँधी से जूझने साँसें जिधर से आती है, उधर ले चलो।

अश्क पर फुदकती मुस्कान जिधर से आती है, उधर ले चलो।

 

(दिनांक 24.6.2021 को Angioplasty के बाद 21.7.2021 के दिन अस्सी साल पूर्ण करने के एक दिन पहले लिखी कविता)

….. भूपेन्द्र कुमार दवे

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