उन्ही गलियों में टहल तो आओ।

दिल ने कहा हमसे ठहर जाओ
कभी उन्ही गलियों में टहल तो जाओ

कभी उन्ही गलियों में फिर से बेहल तो आओ
भरी बरसात में गर्मगरमहट तल तो आओ

किसी की आंखों को छल तो आओ
न इधर न उधर जरा ठहर तो जाओ

माना की बहुत मुश्किल का दौर है
चाहे कितनी भी अंधेरी रात हो होना तो भोर है

खुली किताब में जरा टहल तो आओ
आंखो की तस्वीरों के पल तो पाओ

में खोया रहूं मैं उल्फत मे
रहूं मैं उड़ते हुए खत में

बचपन तो गया
जरा बचपना तो पाओ
किसी की गलियों में फिर से जरा टहल तो आओ

अपनी छत से
किसी मजनू पर पहली बार की हवा तो खाओ
मोबाइल से नहीं कभी हकीकत से भी जी आओ

बातों और सपनों का ख्याल तो कर आओ
किसी की याद में ताल तो जाओ

मोबाइल को मछलियों के जाल सा न बिछाओ
किसी को अपनी आवाज से भी रिझाओ

अच्छा चलो बाटी चोखा खा आओ
कभी हुस्न का धोखा भी खा आओ

पेड़ों पर चढ़ उंगलियां पकड़
पलकों की जकड़
अच्छा चलो कहीं न सही दिल में ही टहल तो आओ

कभी तुम्हारा कभी छत का तारा
कुछ देर ही सही जरा टहल तो आओ।

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