आबादी………………देवेश दीक्षित

आबादी बढ़ रही है इस कदर

कि पग रखना जटिल हो गया

और पग भी रुक रहे हैं इस कदर

कि आगे बढ़ना मुस्किल हो गया

 

पग खिच रहे है पीछे को

देख कर संघर्ष का जलवा

देखो इस बेरोजगारी को

मुंह फाड़े खड़ा है ऐसे जैसे मिलेगा इसको हलवा

 

बेरोजगारी ने संस्कार को तोड़ा

पेट की आग ने जुर्म से जोड़ा

लूट पाट चोरी और डकैती

बन गए अब उसकी सहेली

 

जीवन को संकट में डाल के अपना

लूट पाट कर पेट को भरने अपना

जिन्दगी की लड़ाई लड़ रहा है

चोरी डकैती के लिए अब अड़ रहा है

 

काश मिल जाता सबको रोजगार

तो न होती ये कभी लूट मार

जीवन सबका सफल होता

फिर न कोई अपराधी होता

 

चैन की सांस लेते सब

खुशहाल जीवन जीते जब

बेरोजगारी का नाम न होता

अपराध का नामो निशान न होता

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देवेश दीक्षित

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