मेरी शायरी – अरुण कुमार झा बिट्टू

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कल एक मोर पर देखा कहीं से आ रही थी वो।
संग में कोई था कुछ बतला रही थी वो।
मुझे देखते ही थम गई चुप हुई थोड़ा मुस्कुराया उसने।
जैसे कोई पछतावा था , कोई दर्द था और दबा रही थी वो।

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टूटे हुए सपनो की लड़ी लग रही है।
ये जिंदगी पहाड़ सी बड़ी लग रही हैं।
तुम होती तो होता सुगंधित उपवन
पर तुम नहीं हो तो कटो की गली लग रही हैं।

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सोने का घड़ा सुंदर और कीमती हो सकता है।
पर माटी के घड़े की जगह कभी नहीं ले सकता
मेरे साथी ना समझो मेरे तकरार को बेकद्री अपनी।
मै धड़कन हूं पर तुम तो जान हो मेरी।

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ये धरती उस जन्नत से भी खास होगा।
जिस दिन मेरे हाथो मे तेरा हाथ होगा।
चहक उठेंगे हम तुम किसी परिंदे कि तरह
और प्रेममय ये सारा कायनात होगा।

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जिंदगी का हर एक सपना तोर दे हम
अजी इतना ना सताओ की तड़पना छोर दे हम

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ना सकूं हैं ना चैन है।
बड़ी मुश्किल में दिन रैन है।
क्यों करते हैं लोग मुहब्बत
क्या इसी के लिए बेचैन है।

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अजी दर्द देने वालो का लोग इबादत करते हैं।
अजी कोई रोग है कोई बला है ।
जिसे सब मुहब्बत कहते हैं।

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मुहब्बत तो हुआ था हमें
पर वक्त ने निभाने ना दिया।
कुछ ऐसे थे हालात जिसने।
मजनू सा बन जाने ना दिया।

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कुछ तो है तेरे मेरे बीच
जो रिश्तों। को सिचती रहती है।
मै तुझसे दूर रहूं या राहु बहुत ही नजदीक
पर ये तेरे ओर ही मुझको खीचती रहती है।

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